Updated On: 29 Aug, 2026

“तुम राजनीति के लायक नहीं हो”… फिर माफी मांगने का दबाव? BJP शहडोल में आदिवासी महिला नेत्री प्रकरण ने पकड़ा तूल

जिला मंत्री से महिला मोर्चा जिला मंत्री बनाने पर सवाल, कथित दुर्व्यवहार के बाद मीडिया के सामने आईं गीता सिंह; वीडियो हटाने और माफी मांगने का दबाव बनाने के भी आरोप

शहडोल। भारतीय जनता पार्टी शहडोल जिला संगठन की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला पार्टी की सक्रिय महिला कार्यकर्ता, जिला मंत्री एवं निर्वाचित जनपद सदस्य गीता सिंह से जुड़ा है। संगठनात्मक फेरबदल के बाद सामने आए घटनाक्रम ने न केवल भाजपा के अंदर कार्यकर्ताओं के सम्मान को लेकर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि महिला और आदिवासी नेतृत्व को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।
बताया जा रहा है कि गीता सिंह भाजपा संगठन में जिला मंत्री के पद पर सक्रिय थीं। वह निर्वाचित जनपद सदस्य हैं, उच्च शिक्षित हैं और सोशल वर्क में मास्टर डिग्री रखती हैं। इसके बावजूद उन्हें जिला मंत्री पद से हटाकर महिला मोर्चा जिला मंत्री की जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर सवाल उठे।
“तुम राजनीति के लायक नहीं हो”—कथित बातचीत ने मचाई हलचल
पद परिवर्तन को लेकर जब गीता सिंह ने भाजपा जिला अध्यक्ष अमिता चपरा से बातचीत की तो कथित तौर पर उन्हें कहा गया कि “तुम राजनीति के लायक नहीं हो।”
यही कथित टिप्पणी अब पूरे मामले का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है।
सवाल यह है कि जिस महिला ने ग्रामीण क्षेत्र में जनता के बीच चुनाव जीतकर जनपद सदस्य का दायित्व हासिल किया, जो संगठन में सक्रिय रही और लगातार राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेती रही, उसे आखिर किस आधार पर राजनीति के योग्य नहीं माना गया?
क्या किसी महिला कार्यकर्ता को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ने के लिए जनता का समर्थन नहीं, बल्कि संगठन में किसी खास व्यक्ति की कृपा चाहिए?
दुर्व्यवहार के बाद मीडिया के सामने आईं गीता सिंह
बताया जाता है कि कथित दुर्व्यवहार के बाद गीता सिंह मीडिया के सामने आईं और उन्होंने अपने साथ हुई पूरी घटना को सार्वजनिक रूप से बताया। उनका बयान सामने आने के बाद मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा।
इसके बाद घटनाक्रम ने एक नया मोड़ लिया।
“वीडियो बनाकर डाल दो कि बयान गलती से दिया था”—दबाव के आरोप
गीता सिंह से जुड़े लोगों का आरोप है कि बयान वायरल होने के बाद जैतपुर क्षेत्र में भाजपा के कथित नेतृत्वकर्ता एवं जिला अध्यक्ष के करीबी माने जाने वाले कुछ लोगों द्वारा उन पर दबाव बनाया गया।
कथित तौर पर उनसे कहा गया कि वह वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर यह कहें कि—
“मैंने जो बयान दिया था, वह गलती से दे दिया था और मैं जिला अध्यक्ष से माफी मांगती हूं।”
हालांकि इस कथित दबाव की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन यदि किसी महिला जनप्रतिनिधि द्वारा अपने साथ हुई घटना सार्वजनिक करने के बाद उसे बयान वापस लेने और माफी मांगने के लिए दबाव बनाया गया है, तो यह अपने आप में गंभीर संगठनात्मक सवाल है।
लेकिन गीता सिंह झुकने वाली नहीं!
मामले में सबसे चर्चित बात यह है कि गीता सिंह ने कथित दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया।
सवाल यह भी है कि अगर गीता सिंह ने कोई गलत बयान नहीं दिया, तो उन्हें माफी क्यों मांगनी चाहिए?
यदि वास्तव में उनके साथ अभद्रता हुई है तो क्या माफी मांगने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की नहीं होनी चाहिए, जिसने कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया?
एक तरफ आदिवासी उत्थान की बात, दूसरी तरफ आदिवासी महिला को दबाने का आरोप?
भाजपा देश और प्रदेश में आदिवासी समाज के उत्थान, महिला सशक्तिकरण और आदिवासी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की बात लगातार करती रही है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—
अगर आदिवासी महिलाओं को राजनीतिक रूप से मजबूत करना भाजपा की प्राथमिकता है, तो फिर संगठन में सक्रिय एक आदिवासी महिला कार्यकर्ता के साथ कथित तौर पर ऐसा व्यवहार क्यों?
क्या आदिवासी महिला का सम्मान केवल मंचों और भाषणों तक सीमित है?
या फिर वास्तव में उसे संगठन में निर्णय लेने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी मिलेगी?
“अगर आदिवासी नेतृत्व बढ़ाना है तो अंतिम छोर की महिला को जिला अध्यक्ष बनाकर दिखाइए”
राजनीति में पद देना या लेना संगठन का अधिकार है। इसलिए गीता सिंह को महिला मोर्चा में भेजना अपने आप में संगठनात्मक निर्णय हो सकता है।
लेकिन असली सवाल व्यवहार और सम्मान का है।
अगर भाजपा वास्तव में अंतिम छोर पर बैठे आदिवासी समाज और महिलाओं को नेतृत्व देना चाहती है, तो क्यों न किसी जमीनी आदिवासी महिला कार्यकर्ता को जिला संगठन की सर्वोच्च जिम्मेदारी देकर उदाहरण प्रस्तुत किया जाए?
क्यों न यह साबित किया जाए कि भाजपा में राजनीतिक पद पाने के लिए केवल प्रभावशाली लोगों की नजदीकी नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाला कार्यकर्ता भी आगे आ सकता है?
पहले जिला मंत्री बनाया, फिर हटा दिया—आखिर कारण क्या?
संगठन के भीतर यह सवाल भी चर्चा में है कि यदि गीता सिंह जिला मंत्री के योग्य थीं तो उन्हें यह जिम्मेदारी दी ही क्यों गई थी?
और यदि अब वह राजनीति के योग्य नहीं हैं, जैसा कथित रूप से कहा गया, तो क्या संगठन यह स्पष्ट करेगा कि ऐसा क्या बदल गया कि कुछ समय में ही उनकी राजनीतिक योग्यता पर सवाल उठने लगे?
क्या पद देने और हटाने का कोई स्पष्ट मापदंड है?
क्या कार्यकर्ताओं को इसकी जानकारी दी जाती है?
या फिर संगठनात्मक फैसले कुछ लोगों के बीच ही तय हो जाते हैं?
जिला अध्यक्ष के पुराने कथित ऑडियो की भी चर्चा
इस पूरे विवाद के बीच जिला अध्यक्ष अमिता चपरा से जुड़ा एक कथित ऑडियो भी चर्चा में आने की बात सामने आ रही है, जिसमें आदिवासी कोटा को लेकर कथित टिप्पणियों का जिक्र बताया जा रहा है।
हालांकि उक्त ऑडियो की प्रामाणिकता, रिकॉर्डिंग का संदर्भ और उसमें कही गई बातों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी आवश्यक है।
यदि ऑडियो वास्तविक है और उसमें आदिवासी आरक्षण/कोटा को लेकर आपत्तिजनक या भेदभावपूर्ण टिप्पणी की गई है, तो भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व को इसकी निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब सवाल भाजपा के प्रदेश नेतृत्व से
यह मामला अब केवल एक पदाधिकारी के पद परिवर्तन तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। यह सवाल संगठन में महिला कार्यकर्ताओं के सम्मान, आदिवासी नेतृत्व, आंतरिक लोकतंत्र और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार तक पहुंच गया है।
भाजपा नेतृत्व से सवाल है—
1. क्या गीता सिंह को वास्तव में “राजनीति के लायक नहीं” कहा गया?
2. यदि कहा गया तो इसका आधार क्या था?
3. क्या उन्हें अपना मीडिया बयान वापस लेने और माफी मांगने के लिए किसी ने दबाव बनाया?
4. जिला मंत्री से महिला मोर्चा में भेजने का वास्तविक कारण क्या है?
5. वायरल बताए जा रहे कथित ऑडियो की जांच भाजपा संगठन कब कराएगा?
6. क्या पार्टी में महिला और आदिवासी कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने की पूरी स्वतंत्रता है?
सवाल बड़ा है—आखिर कार्यकर्ता चाहिए या सिर्फ समर्थक?
राजनीतिक संगठन कार्यकर्ताओं से बनता है। कार्यकर्ता तब मजबूत होता है जब उसे अपनी बात कहने का अधिकार हो और असहमति को दुश्मनी न माना जाए।
गीता सिंह का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक महिला नेता की व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल को सामने ला रहा है कि क्या जमीनी कार्यकर्ता वास्तव में संगठन में अपनी जगह और सम्मान के साथ आगे बढ़ सकता है?
अब निगाह भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व पर है।
क्या पार्टी इस पूरे मामले पर निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाएगी?
या फिर यह मामला भी संगठन की अंदरूनी राजनीति में दबकर रह जाएगा?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक पद का नहीं है—सवाल है एक महिला कार्यकर्ता के सम्मान का, एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि की गरिमा का और उस आदिवासी नेतृत्व का, जिसकी मजबूती की बात राजनीतिक मंचों से बार-बार की जाती है।