रेत माफिया के आगे अफसरशाही शून्य! जैतपुर की तितरा–कुनूक नदी से धड़ल्ले से हो रहा अवैध रेत परिवहन, अफसर अली पर गंभीर आरोप
जैतपुर क्षेत्र में अवैध रेत परिवहन एक बार फिर खुलेआम कानून को चुनौती देता नजर आ रहा है। तितरा–कुनूक नदी से रेत का अवैध खनन और परिवहन धड़ल्ले से जारी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग और अफसरशाही पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। स्थानीय लोगों और किसानों का आरोप है कि रेत माफिया अफसर अली ने प्रशासनिक संरक्षण के दम पर अवैध रेत परिवहन और गुंडागर्दी का पूरा साम्राज्य खड़ा कर लिया है।
“थाना प्रभारी रिश्तेदार” का दावा, कानून से बेखौफ माफिया
क्षेत्र में चर्चा है कि अफसर अली खुद को इतना ताकतवर बताता फिर रहा है कि “थाना प्रभारी मेरा रिश्तेदार है, गोहपारू और जैतपुर दोनों जगह सब सेट है, मेरा कुछ नहीं होगा।” यही वजह है कि दिन-दहाड़े नदी से रेत निकाली जा रही है, ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपर बिना रोक-टोक सड़कों पर दौड़ रहे हैं। न तो परिवहन की अनुमति, न खनन का वैध पट्टा—फिर भी कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े करता है।
किसानों और जलीय जीवों को भारी नुकसान
कुनूक नदी क्षेत्र के किसानों का कहना है कि अवैध खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बिगड़ गया है। खेतों में पानी की समस्या बढ़ रही है, किनारे कटाव हो रहा है और सिंचाई व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, अत्यधिक रेत खनन से जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। मछलियों के प्रजनन स्थल नष्ट हो रहे हैं और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
माइनिंग विभाग की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल माइनिंग विभाग की भूमिका को लेकर है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग को सब कुछ पता होने के बावजूद वह चुप्पी साधे बैठा है। न कोई निरीक्षण, न छापा, न ही अवैध परिवहन पर रोक। क्या यह चुप्पी डर की वजह से है या फिर सेटिंग इतनी मजबूत है कि कार्रवाई से सभी बचते नजर आ रहे हैं?
कुनूक नदी रेत खत्म होने के कगार पर
ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में कुनूक नदी से रेत पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इससे न केवल पर्यावरणीय संकट गहराएगा, बल्कि भविष्य में जल संकट भी उत्पन्न हो सकता है। नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
प्रशासन पर उठे गंभीर प्रश्न
अवैध रेत खनन के इस खेल में प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर क्यों अफसरशाही मूकदर्शक बनी हुई है? क्या राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के चलते रेत माफिया बेलगाम हो गए हैं? आम जनता और किसान पूछ रहे हैं कि जब कानून सबके लिए समान है, तो फिर रेत माफिया पर कार्रवाई क्यों नहीं?
जैतपुर की तितरा–कुनूक नदी से उठती रेत की धूल अब सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की पोल भी खोल रही है। सवाल साफ है—रेत माफिया के आगे अफसरशाही आखिर कब तक शून्य बनी रहेगी?

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