ख़बर TAP की विशेष रिपोर्ट: जिन हाथों में किताब होनी थी, वहां खाली थाली — बुढार का प्राथमिक विद्यालय बना सिस्टम की विफलता की मिसाल
एक माह से बंद मध्यान्ह भोजन, भूखे बच्चों की शिक्षा से हो रहा खिलवाड़
विकास खण्ड बुढार के नगबसियान टोला (बारगवां–24) से शर्मनाक और चिंताजनक रिपोर्ट
मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी और संवेदनशील मध्यान्ह भोजन योजना, जिसका उद्देश्य गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों को पोषण देकर शिक्षा से जोड़ना है, वही योजना आज विकास खण्ड बुढार अंतर्गत संकुल साखी के शासकीय प्राथमिक विद्यालय नगबसियान टोला (बारगवां–24) में पिछले एक महीने से पूरी तरह ठप पड़ी है। हालत यह है कि नौनिहाल बच्चे रोज़ाना स्कूल तो आ रहे हैं, लेकिन भूखे पेट, उम्मीदों और सवालों के साथ।
इस विद्यालय में मध्यान्ह भोजन का संचालन गांधी स्व-सहायता समूह, बरगवां–24 के माध्यम से किया जाता है। समूह की अध्यक्ष फूलबाई पनिका और सचिव लक्ष्मी पनिका पर आरोप है कि उनकी घोर लापरवाही के कारण बच्चों का भोजन बंद है। सवाल यह है कि जब बच्चों का निवाला छीना जा रहा था, तब संकुल से लेकर विकास खण्ड और जिला स्तर तक बैठे अधिकारी आखिर क्या कर रहे थे?
कुंभकर्णी नींद में प्रशासन
एक माह से मध्यान्ह भोजन बंद होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा शिक्षा तंत्र कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ हो। जिन अधिकारियों का दायित्व है कि वे योजनाओं की नियमित मॉनिटरिंग करें, वही अधिकारी आज इस गंभीर मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी योजना के साथ खुला मज़ाक और बच्चों के भविष्य के साथ अपराध है। क्योंकि मध्यान्ह भोजन केवल खाना नहीं, बल्कि बच्चों की सेहत, उनकी उपस्थिति और सीखने की क्षमता से जुड़ा हुआ है।
शिक्षक ने निभाई जिम्मेदारी, सिस्टम फेल
विद्यालय में पदस्थ प्राध्यापक तेजबली सिंह ने इस गंभीर समस्या को लेकर लगातार अपने संबंधित विभाग को लिखित सूचना दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि बच्चे भूखे हैं, मध्यान्ह भोजन बंद है और इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि जिम्मेदार शिक्षक तो अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन ऊपर बैठे अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े हुए हैं। जब लिखित शिकायतों पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठता है कि आखिर शिकायतों का मतलब क्या रह जाता है?
भूख ने गिरा दिया बच्चा
मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब विद्यालय में पदस्थ अतिथि शिक्षिका हरप्रसाद प्रजापति बताते हैं कि कुछ दिन पहले एक छात्र भूखे पेट होने के कारण चक्कर खाकर गिर पड़ा। यह घटना पूरे सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है।
हरप्रसाद प्रजापति ने बताया कि अधिकांश बच्चे सुबह-सुबह घर से बिना कुछ खाए स्कूल आते हैं। गरीब परिवारों के ये बच्चे मध्यान्ह भोजन पर ही निर्भर रहते हैं। जब स्कूल में भोजन नहीं मिलता, तो वे पूरे दिन भूखे रहते हैं और शाम चार बजे के आसपास घर लौटते हैं। ऐसे में न तो पढ़ाई हो पाती है, न ही उनका शारीरिक और मानसिक विकास।
बच्चों की आंखों में भूख और इंतज़ार
जब हमारी टीम ने विद्यालय में पहुंचकर छात्रों से बातचीत की, तो दृश्य बेहद मार्मिक था। बच्चों की आंखों में सवाल थे, उम्मीद थी और भूख साफ झलक रही थी। ऐसा लग रहा था मानो वे किसी के आने का इंतज़ार कर रहे हों, जो उनके लिए खाना लेकर आए और उनकी भूख मिटाए। छोटे-छोटे बच्चों ने बताया कि कई दिनों से उन्हें स्कूल में खाना नहीं मिला। कुछ बच्चों ने कहा कि पेट में दर्द होता है, तो कुछ ने बताया कि भूख लगने पर पढ़ाई में मन नहीं लगता। यह दृश्य उन तमाम दावों को झूठा साबित करता है, जिनमें सरकार बच्चों के पोषण और शिक्षा की बात करती है।
कागज़ों में चल रही योजना?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मध्यान्ह भोजन योजना केवल कागज़ों में चल रही है?
अगर एक महीने से भोजन बंद है, तो: क्या उपस्थिति रजिस्टर में नियमित भोजन वितरण दर्ज किया जा रहा है?
क्या फर्जी रिपोर्ट भेजी जा रही है? क्या राशन और राशि का दुरुपयोग हो रहा है? इन सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे। क्योंकि यदि ऐसा है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का गंभीर मामला बनता है।
जिम्मेदारी तय होनी चाहिए
इस पूरे मामले में सिर्फ स्व-सहायता समूह ही नहीं, बल्कि: संकुल प्रभारी, विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी, जनपद और जिला स्तर के अधिकारी सभी की भूमिका संदेह के घेरे में है। जब एक महीने तक बच्चों को भोजन नहीं मिला, तो किसी ने निरीक्षण क्यों नहीं किया? किसी ने वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की?
बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
यह मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है। जिन बच्चों के हाथों में किताब होनी चाहिए, उनके हाथ खाली हैं। जिन बच्चों के पेट में पोषण होना चाहिए, वहां भूख है। और जिन अधिकारियों को जवाबदेह होना चाहिए, वे मौन हैं।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि:
1. इस पूरे मामले की तत्काल उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
2. दोषी स्व-सहायता समूह पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
3. बच्चों के लिए तुरंत वैकल्पिक भोजन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
4. भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो, इसके लिए सख्त निगरानी तंत्र बनाया जाए।
क्योंकि अगर आज प्राथमिक विद्यालय के बच्चे भूखे रह गए, तो कल यही भूख उनके सपनों को भी निगल जाएगी।
अब सवाल यही है—आखिर कब जागेगा प्रशासन, और कब बच्चों को उनका हक़ मिलेगा?

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