जैतपुर में अवैध रेत खनन: “नदी मेरी, रेत मेरी” कहने वाला अफसर अली, प्रशासन पर संरक्षण के गंभीर आरोप
जैतपुर - खबरTAP ब्रेकिंग
अफसर अली का खुलेआम ऐलान, IPC–MMDR–पर्यावरण कानून की धज्जियाँ, संरक्षण में पलता अवैध रेत साम्राज्य**
तितरा–कुनुक नदी अब सिर्फ़ एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं रही, बल्कि यह अवैध रेत खनन, प्रशासनिक संरक्षण और कानून की खुली हत्या का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है। अवैध रेत कारोबार के कथित सरगना अफसर अली का धमकी भरा बयान— “नदी मेरी है, रेत मेरी है और प्रशासन भी मेरा है”— सीधे-सीधे भारतीय कानून, शासन व्यवस्था और पुलिस तंत्र को चुनौती है।
यह बयान महज़ दंभ नहीं, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलता है जो या तो बिक चुका है या फिर डर के आगे नतमस्तक हो चुका है।
किन-किन कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ रही हैं?
अफसर अली और उसके नेटवर्क पर अगर निष्पक्ष जांच हो, तो एक-दो नहीं बल्कि कई गंभीर धाराएँ स्वतः लागू होती हैं—
MMDR Act, 1957 (खनिज एवं खनन अधिनियम)
धारा 4(1) व 4(1A): बिना वैध अनुमति खनन पूर्णतः अपराध
धारा 21(1) व 21(5): अवैध खनन पर कारावास, जुर्माना और वाहन जब्ती का प्रावधान
भारतीय दंड संहिता (IPC)
धारा 379: सरकारी संपत्ति (रेत) की चोरी
धारा 447: अवैध अतिक्रमण
धारा 506: धमकी देना
धारा 120B: आपराधिक षड्यंत्र
धारा 34: साझा आपराधिक मंशा
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
धारा 15: पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने पर 5 साल तक की सजा व जुर्माना
NGT व सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश
रात में खनन पूर्ण प्रतिबंध
सवाल यह है— किसके आदेश से? किसकी अनुमति से?
थाना प्रभारी से रिश्तेदारी या साठगांठ?
सूत्रों के अनुसार अफसर अली खुद यह प्रचार करता फिरता है कि थाना प्रभारी उसका रिश्तेदार है और “सब मैनेज” है। अगर यह दावा झूठा है तो थाना प्रभारी सार्वजनिक रूप से इसका खंडन क्यों नहीं करते?
और अगर यह सच है, तो यह सीधे-सीधे धारा 166 IPC (लोक सेवक द्वारा कानून का उल्लंघन) का मामला बनता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जब वे अवैध खनन का विरोध करते हैं, तो उन्हें उल्टे अफसर अली के द्वारा डराया धमकाया जाता है। यह धारा 107/151 CrPC का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?
कार्रवाई सिर्फ़ गरीबों पर, माफिया पर क्यों नहीं?
यह सबसे बड़ा सवाल है। छोटे ट्रैक्टर मालिकों पर कार्रवाई, चालान और जब्ती तुरंत हो जाती है, लेकिन अफसर अली की ट्रेक्टर बेरोकटोक दौड़ती हैं।
क्या कानून सिर्फ़ गरीबों के लिए है?
क्या रसूखदारों के लिए IPC, MMDR Act और पर्यावरण कानून लागू नहीं होते?
प्रशासन की चुप्पी = सहमति?
जब अपराध खुलेआम हो और प्रशासन चुप रहे, तो यह चुप्पी अपराध में साझेदारी मानी जाती है।
अगर जल्द ही—
अवैध खनन स्थल सील नहीं हुए
अफसर अली और उसके वाहन जब्त नहीं हुए
थाना प्रभारी व जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच नहीं हुई
तो यह साफ़ हो जाएगा कि अफसर अली का “फरमान” सिर्फ़ बयान नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत है।
अब सवाल जनता का है
क्या शासन अफसर अली से बड़ा है या अफसर अली शासन से?
क्या तितरा–कुनुक नदी बचेगी या रेत माफिया की जागीर बन जाएगी?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं—
या तो कानून बोलेगा, या फिर माफिया का फरमान चलेगा।

Leave a Reply